Krishna

Goshalas


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भूमिका

गाय का यूं तो पूरी दुनिया में ही काफी महत्व है, लेकिन भारत के संदर्भ में बात की जाए तो प्राचीन काल से यह भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही है। चाहे वह दूध का मामला हो या फिर खेती के काम में आने वाले बैलों का। वैदिक काल में गायों की संख्‍या व्यक्ति की समृद्धि का मानक हुआ करती थी। दुधारू पशु होने के कारण यह बहुत उपयोगी घरेलू पशु है।

गाय एक महत्त्वपूर्ण पालतू जानवर है। इससे हमें उत्तम किस्म का दूध प्राप्त होता है। रेड सिन्धी, साहिवाल, गिर, देवनी, थारपारकर आदि नस्लें भारत में दुधारू गायों की प्रमुख नस्लें हैं। भारत में गाय की 28 नस्लें पाई जाती हैं। हिन्दू, गाय को ‘माता’ (गौमाता) कहते हैं। हिन्दू धर्म में यह विश्वास है कि गाय देवत्व और प्राकृतिक कृपा की प्रतिनिधि है, और इसलिए इसकी रक्षा तथा पूजा की जानी चाहिए। हिन्दू धर्म में गाय की पूजा का मूल आरंभिक वैदिक काल में खोजा जा सकता है। भारोपीय लोग, जिन्होंने दूसरी सहस्राब्दी ई।पू। में भारत में प्रवेश किया, वे पशुपालक थे। पशुओं का बड़ा आर्थिक महत्त्व था, जो वैदिक धर्म में भी दिखाई देता है। यद्यपि प्राचीन भारत में गायों और बैलों की बलि दी जाती थी और उनका माँस खाया जाता था। लेकिन दुधारू गायों की बलि क्रमश: बंद की जा रही थी। जैसे महाभारत व मनुस्मृति के हिस्सों में और ऋग्वेद में दुधारू गाय को पहले से ही ‘अवध्य’ कहा गया था।

गाय की पूज्यता का संकेत उपचार शुद्धिकरण और प्रायश्चित के संस्कारों में पंचगव्य, गाय के पांच उत्पादन, दूध दही, मक्खन, मूत्र और गोबर के प्रयोग से मिलता है। बाद में अहिंसा के आदर्श के उदय के साथ गाय अहिंसक उदारता के जीवन का प्रतीक बन गई। साथ ही इस तथ्य के आधार पर कि उसके उत्पादन पोषण प्रदान करते हैं। गाय को मातृत्व और धरती माँ से भी संबद्ध किया गया। गाय को पहले पहल ब्राह्मण (या पुरोहित) वर्ग के साथ भी जोड़ा गया और उसे मारना कभी-कभी (ब्राह्मणों द्वारा) ब्रह्म हत्या जैसा निंदनीय कार्य माना जाता था। ईसा की पहली शताब्दी के मध्य में गुप्त राजाओं द्वारा गाय की हत्या करने पर मृत्युदंड का प्रावधान किया गया।

उपयोगिता: ‘गायें परम पवित्र, परम मंगलमयी, स्वर्ग का सोपान, सनातन एवं धन्यस्वरूपा हैं।’ गाय का दूध बहुत ही पौष्टिक होता है। यह बीमारों और बच्चों के लिए बेहद उपयोगी आहार माना जाता है। इसके अलावा दूध से कई तरह के पकवान बनते हैं। दूध से दही, पनीर, मक्खन और घी भी बनाता है। गाय का घी और गोमूत्र अनेक आयुर्वेदिक औषधियां बनाने के काम भी काम आता है। गाय का गोबर फसलों के लिए सबसे उत्तम खाद है। गाय के मरने के बाद उसका चमड़ा, हड्डियां व सींग सहित सभी अंग किसी न किसी काम आते हैं।

अन्य पशुओं की तुलना में गाय का दूध बहुत उपयोगी होता है। बच्चों को विशेष तौर पर गाय का दूध पिलाने की सलाह दी जाती है क्योंकि भैंस का दूध जहां सुस्ती लाता है, वहीं गाय का दूध बच्चों में चंचलता बनाए रखता है। माना जाता है कि भैंस का बच्चा (पाड़ा) दूध पीने के बाद सो जाता है, जबकि गाय का बछड़ा अपनी मां का दूध पीने के बाद उछल-कूद करता है।

गाय न सिर्फ अपने जीवन में लोगों के लिए उपयोगी होती है वरन मरने के बाद भी उसके शरीर का हर अंग काम आता है। गाय का चमड़ा, सींग, खुर से दैनिक जीवनोपयोगी सामान तैयार होता है। गाय की हड्‍डियों से तैयार खाद खेती के काम आती है। गाय दुनिया की सर्व श्रेश्ठ प्राणी है इसकी उपयोगिता, महत्वता और आवष्यकता धार्मिक, आध्यात्मिक सांस्कृतिक वैज्ञानिक और आर्थिक दृश्टि कोण से वर्तमान में प्रमाणित हो चुकी है।

कलयुग में गोहत्या रुपी कंलक से पीडित आधुनिक भोगवादी मानव के अत्याचार की षिकार वेद वर्णित कामधेनु रुवरुप गाय आज स्वंय को बचाने के लिए सम्पूर्ण मानव जाति का कारुणि आह्वान करती है। ब्राह्मण्ड पालक -पोशक,जीवनी षक्ति का दान करने वाली जगत अधिश्ठात्री विष्व जननी भगवती, करुणा दया, अहिंसा, यक्षा एवं वात्सल्य की प्रतिमूर्ति और अभयदान देने में समर्थ भगवद ऊर्जा, ऋशि ऊर्जा एवं मानव ऊर्जा का मिश्रित स्रोत को हमने माता का दर्जा देकर, 33 करोड देवों का वास गोमाता में बताकर हिन्दू धर्म ने गोमाता को सर्वोच्च स्थान पर विराजित कर आरम्भ से ही इसकी उपयोगिता, महत्वता और आवष्यकता को मान्य किया है। इसके संरक्षण, सर्वधन एंव पालन के लिए न्यास पूरे देष में गौ सम्बधि क्षेत्र में धार्मिक, आध्यात्मिक, वैज्ञानिक, सामाजिक व आर्थिक दृश्टि से हो रहे कार्यो का प्रचार -प्रसार कर मानव जीवन में सुख-षान्ति व समृद्धि के लिए गोमाता के अतिमहत्वपूर्ण योगदान व आवष्यकता को जनमानस में स्थापित करने का प्रयास करेगा।

शारीरिक संरचना: गाय का एक मुंह, दो आंखें, दो कान, चार थन, दो सींग, दो नथुने तथा चार पांव होते हैं। पांवों के खुर गाय के लिए जूतों का काम करते हैं। गाय की पूंछ लंबी होती है तथा उसके किनारे पर एक गुच्छा भी होता है, जिसे वह मक्खियां आदि उड़ाने के काम में लेती है। गाय की एकाध प्रजाति में सींग नहीं होते।

गायों की प्रमुख नस्लें: गायों की यूं तो कई नस्लें होती हैं, लेकिन भारत में मुख्‍यत: सहिवाल (पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, बिहार), गीर (दक्षिण काठियावाड़), थारपारकर (जोधपुर, जैसलमेर, कच्छ), करन फ्राइ (राजस्थान) आदि हैं। विदेशी नस्ल में जर्सी गाय सर्वाधिक लोकप्रिय है। यह गाय दूध भी ‍अधिक देती है। गाय कई रंगों जैसे सफेद, काला, लाल, बादामी तथा चितकबरी होती है। भारतीय गाय छोटी होती है, जबकि विदेशी गाय का शरीर थोड़ा भारी होता है।

भारत की गोजातियाँ निम्नलिखित हैं:

  • सायवाल जाति: सायवाल गायों में अफगानिस्तानी तथा गीर जाति का रक्त पाया जाता है। इन गायों का सिर चौड़ा, सींग छोटी और मोटी, तथा माथा मझोला होता है। ये पंजाब में मांटगुमरी जिला और रावी नदी के आसपास लायलपुर, लोधरान, गंजीवार आदि स्थानों में पाई जाती है। ये भारत में कहीं भी रह सकती हैं। एक बार ब्याने पर ये १० महीने तक दूध देती रहती हैं। दूध का परिमाण प्रति दिन १०-१६ लीटर होता है। इनके दूध में मक्खन का अंश पर्याप्त होता है।
  • सिंधी: इनका मुख्य स्थान सिंध का कोहिस्तान क्षेत्र है। बिलोचिस्तान का केलसबेला इलाका भी इनके लिए प्रसिद्ध है। इन गायों का वर्ण बादामी या गेहुँआ, शरीर लंबा और चमड़ा मोटा होता है। ये दूसरी जलवायु में भी रह सकती हैं तथा इनमें रोगों से लड़ने की अद्भुत शक्ति होती है। संतानोत्पत्ति के बाद ये ३०० दिन के भीतर कम से कम २००० लीटर दूध देती हैं।
  • काँकरेज: कच्छ की छोटी खाड़ी से दक्षिण-पूर्व का भूभाग, अर्थात् सिंध के दक्षिण-पश्चिम से अहमदाबाद और रधनपुरा तक का प्रदेश, काँकरेज गायों का मूलस्थान है। वैसे ये काठियावाड़, बड़ोदा और सूरत में भी मिलती हैं। ये सर्वांगी जाति की गाए हैं और इनकी माँग विदेशों में भी है। इनका रंग रुपहला भूरा, लोहिया भूरा या काला होता है। टाँगों में काले चिह्न तथा खुरों के ऊपरी भाग काले होते हैं। ये सिर उठाकर लंबे और सम कदम रखती हैं। चलते समय टाँगों को छोड़कर शेष शरीर निष्क्रिय प्रतीत होता है जिससे इनकी चाल अटपटी मालूम पड़ती है।
  • मालवी: ये गाएँ दुधारू नहीं होतीं। इनका रंग खाकी होता है तथा गर्दन कुछ काली होती है। अवस्था बढ़ने पर रंग सफेद हो जाता है। ये ग्वालियर के आसपास पाई जाती हैं।
  • नागौरी: इनका प्राप्तिस्थान जोधपुर के आसपास का प्रदेश है। ये गाएँ भी विशेष दुधारू नहीं होतीं, किंतु ब्याने के बाद बहुत दिनों तक थोड़ा थोड़ा दूध देती रहती हैं।
  • थरपारकर: ये गाएँ दुधारू होती हैं। इनका रंग खाकी, भूरा, या सफेद होता है। कच्छ, जैसलमेर, जोधपुर और सिंध का दक्षिणपश्चिमी रेगिस्तान इनका प्राप्तिस्थान है। इनकी खुराक कम होती है।
  • पवाँर: पीलीभीत, पूरनपुर तहसील और खीरी इनका प्राप्तिस्थान है। इनका मुँह सँकरा और सींग सीधी तथा लंबी होती है। सींगों की लबाई १२-१८ इंच होती है। इनकी पूँछ लंबी होती है। ये स्वभाव से क्रोधी होती है और दूध कम देती हैं।
  • भगनाड़ी: नाड़ी नदी का तटवर्ती प्रदेश इनका प्राप्तिस्थान है। ज्वार इनका प्रिय भोजन है। नाड़ी घास और उसकी रोटी बनाकर भी इन्हें खिलाई जाती है। ये गाएँ दूध खूब देती हैं।
  • दज्जल: पंजाब के डेरागाजीखाँ जिले में पाई जाती हैं। ये दूध कम देती हैं।
  • गावलाव: दूध साधारण मात्रा में देती है। प्राप्तिस्थान सतपुड़ा की तराई, वर्धा, छिंदवाड़ा, नागपुर, सिवनी तथा बहियर है। इनका रंग सफेद और कद मझोला होता है। ये कान उठाकर चलती हैं।
  • हरियाना: ये ८-१२ लीटर दूध प्रतिदिन देती हैं। गायों का रंग सफेद, मोतिया या हल्का भूरा होता हैं। ये ऊँचे कद और गठीले बदन की होती हैं तथा सिर उठाकर चलती हैं। इनका प्राप्तिस्थान रोहतक, हिसार, सिरसा, करनाल, गुडगाँव और जिंद है।
  • अंगोल या नीलोर: ये गाएँ दुधारू, सुंदर और मंथरगामिनी होती हैं। प्राप्तिस्थान तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, गुंटूर, नीलोर, बपटतला तथा सदनपल्ली है। ये चारा कम खाती हैं।
  • अन्य:
    • राठ अलवर की गाएँ हैं। खाती कम और दूध खूब देती हैं।
    • गीर- ये प्रतिदिन ५-८ लीटर दूध देती हैं। इनका मूलस्थान काठियावाड़ का गीर जंगल है।
    • देवनी – दक्षिण आंध्र प्रदेश और हिंसोल में पाई जाती हैं। ये दूध खूब देती है।
    • नीमाड़ी – नर्मदा नदी की घाटी इनका प्राप्तिस्थान है। ये गाएँ दुधारू होती हैं।

अमृतमहल, हल्लीकर, बरगूर, बालमबादी नस्लें मैसूर की वत्सप्रधान, एकांगी गाएँ हैं। कंगायम और कृष्णवल्ली दूध देनेवाली हैं।

निष्कर्ष: कुल मिलाकर गाय का मनुष्य के जीवन में बहुत महत्व है। गाय ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तो आज भी रीढ़ है। दुर्भाग्य से शहरों में जिस तरह पॉलिथिन का उपयोग किया जाता है और उसे फेंक दिया जाता है, उसे खाकर गायों की असमय मौत हो जाती है। इस दिशा में सभी को गंभीरता से विचार करना होगा ताकि हमारी ‘आस्था’ और ‘अर्थव्यवस्था’ के प्रतीक गोवंश को बचाया जा सके।

गाय का महत्त्व

भारत में गाय का औषधीय महत्त्व

  • गाय का दूध अमृत के समान है, गाय से प्राप्त दूध, घी, मक्खन से मानव शरीर पुष्ट बनता है।
  • गाय के गोबर का प्रयोग चुल्हें बनाने, आंगन लीपने एवं मंगल कार्यो में लिया जाता है, और यहाँ तक कि गाय के मूत्र से भी विभिन्न प्रकार की दवाइयाँ बनाई जाती है, गाय के मूत्र में कैंसर, टीवी जैसे गंभीर रोगों से लड़ने की क्षमता होती हैं, जिसे वैज्ञानिक भी मान चुके है, तथा गौ-मूत्र के सेवन करने से पेट के सभी विकार दूर होते हैं।
  • भारतीय संस्कृति के अनुसार गाय ही ऐसा पशुजीव है, जो अन्य पशुओं में सर्वश्रेष्ठ और बुद्धिमान माना है।
  • ज्योतिष शास्त्र में भी नव ग्रहों के अशुभ प्रभाव से मुक्ति पाने के लिये गाय का ही वर्णन किया गया हैं।
  • यदि बच्चे को बचपन में गाय का दूध पिलाया जाए तो बच्चे की बुद्धि कुशाग्र होती है।
  • गाय की सेवा से भगवान शिव भी प्रसन्न होते हैं।
  • हाथ-पांव में जलन होने पर गाय के घी से मालिश करने पर आराम मिलेगा।
  • शराब, गांजे या भांग का नशा ज़्यादा हो जाय तो गाय का घी में दो तोला चीनी मिलाकर देने में 15 मिनट में नशा कम हो जायेगा।
  • जल जाने वाले स्थान या घाव को पानी से धोकर गाय का घी लगाने से फफोले कम हो जाते हैं और जलन कम हो जाती है।
  • बच्चों को सर्दी या कफ की शिकायत हो जाये तो गाय के घी से छाती और पीठ पर मालिश करने से तुरन्त आराम मिलता है
  • किसी मनुष्य को अगर हिचकी आये तो उसे रोकने के लिये आधा चम्मच गाय का घी पिलाने से हिचकी रुक जाती है।
  • यदि किसी मनुष्य को सर्प काट जाये तो उसे 70 या 150 ग्राम गाय का ताजा घी पिलाकर 40-50 मिनट बाद जितना गर्म पानी पी सकें, पिलायें। इसके बाद उल्टी-दस्त होंगे, इसके बाद विष का प्रभाव कम होने लगेगा।
भारत में गाय का वैज्ञानिक महत्त्व

  • गाय एकमात्र ऐसा प्राणी है, जो ऑक्सीजन ग्रहण करता है और ऑक्सीजन ही छोड़ता है।
  • गाय के मूत्र में पोटेशियम, सोडियम, नाइट्रोजन, फास्फेट, यूरिया, यूरिक एसिड होता है, दूध देते समय गाय के मूत्र में लेक्टोज की वृद्धि होती है। जो हृदय रोगों के लिए लाभकारी है।
  • गाय का दूध फैट रहित परंतु शक्तिशाली होता है उसे पीने से मोटापा नहीं बढ़ता तथा स्त्रियों के प्रदर रोग आदि में लाभ होता है। गाय के गोबर के कंडे से धुआं करने पर कीटाणु, मच्छर आदि भाग जाते हैं तथा दुर्गंध का नाश होता है।
  • गाय के समीप जाने से ही संक्रामक रोग कफ सर्दी, खांसी, जुकाम का नाश हो जाता है। गौमूत्र का एक पाव रोज़ सुबह ख़ाली पेट सेवन करने से कैंसर जैसा रोग भी नष्ट हो जाता है।
  • गाय के सींग गाय के रक्षा कवच होते हैं। गाय को इसके द्वारा सीधे तौर पर प्राकृतिक ऊर्जा मिलती है। यह एक प्रकार से गाय को ईश्वर द्वारा प्रदत्त एंटीना उपकरण है। गाय की मृत्यु के 45 साल बाद तक भी यह सुरक्षित बने रहते हैं। गाय की मृत्यु के बाद उसके सींग का उपयोग श्रेठ गुणवत्ता की खाद बनाने के लिए प्राचीन समय से होता आ रहा है।
  • गाय के गोबर में विटामिन बी-12 प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। यह रेडियोधर्मिता को भी सोख लेता है।
  • हिंदुओं के हर धार्मिक कार्यों में सर्वप्रथम पूज्य गणेश उनकी माता पार्वती को गाय के गोबर से बने पूजा स्थल में रखा जाता है।
  • गाय की उपस्थिति का पर्यावरण के लिए एक महत्त्वपूर्ण योगदान है, प्राचीन ग्रंथ बताते हैं कि गाय की पीठ पर के सूर्यकेतु स्नायु हानिकारक विकिरण को रोक कर वातावरण को स्वच्छ बनाते हैं।
  • कृषि में गाय के गोबर की खाद्य, औषधि और उद्योगों से पर्यावरण में काफ़ी सुधार है। जुताई करते समय गिरने वाले गोबर और गौमूत्र से भूमि में स्वतः खाद डलती जाती है। प्रकृति के 99% कीट प्रणाली के लिये लाभ दायक है, गौमूत्र या खमीर हुए छाछ से बने कीटनाशक इन सहायक कीटों को प्रभावित नहीं करते एक गाय का गोबर 7 एकड़ भूमि को खाद और मूत्र 100 एकड़ भूमि की फसल को कीटों से बचा सकता है।
  • चाय, कॉफ़ी जैसे लोकप्रिय पेय पदार्थों में दूध एक जरूरी पदार्थ है, भारत में ऐसी अनेक मिठाइयाँ जो गौ दूध पर आधारित होती है। दही, मक्खन और घी भारतीय भोजन के आवश्यक अंग हैं। घी में तले व्यंजनों का खाद अप्रतिम होता है। छाछ न केवल प्यास बुझाती हैं बल्की बहुत से प्रचलित व्यंजनों का आधार है।
भारत में गाय का धार्मिक महत्त्व

  • भारतीय संस्कृति के अनुसार गाय और मंदिरों का एक दूसरे से मज़बूत रिश्ता है, धार्मिक अनुष्ठानों में गाय की अपनी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका है।
  • गाय को दैविक माना गया है, तथा हिन्दू संस्कृति के अनुसार दिन की शुरुआत गाय की पूजा से शुरू होती है। गाय को खिलाना और उसकी पूजा करना दैविक अनुष्ठान है ।
  • पारिवारिक उत्सवों तथा त्योहारों में गाय की प्रधानता है, ऐसे अनेक त्योहार है, जहाँ गाय अपना एक प्रमुख स्थान रखती है।
  • अनेक मंदिरों के प्रवेशद्वार पर गाय का छप्पर होता है जिससे मनुष्य में पवित्रता की भावना बढ़ती है।
  • हिंदुओं के हर धार्मिक कार्यों में सर्वप्रथम पूज्य गणेश उनकी माता पार्वती को गाय के गोबर से बने पूजा स्थल में रखा जाता है।

गौशाला

गौसेवा

अनादिकाल से मानवजाति गौमाता की सेवा कर अपने जीवन को सुखी, सम्रद्ध, निरोग, ऐश्वर्यवान एवं सौभाग्यशाली बनाती चली आ रही है। गौमाता की सेवा के माहात्म्य से शास्त्र भरे पड़े है।

गौ को घास खिलाना कितना पुण्यदायी: तीर्थ स्थानों में जाकर स्नान दान से जो पुन्य प्राप्त होता है, ब्राह्मणों को भोजन कराने से जिस पुन्य की प्राप्ति होती है, सम्पूर्ण व्रत-उपवास, तपस्या, महादान तथा हरि की आराधना करने पर जो पुन्य प्राप्त होता है, सम्पूर्ण प्रथ्वी की परिक्रमा, सम्पूर्ण वेदों के पढने तथा समस्त यज्ञो के करने से मनुष्य जिस पुन्य को पाता है, वही पुन्य  बुद्धिमान पुरुष गौ माता को ग्रास खिलाकर प्राप्त कर लेता है।

गौ सेवा से वरदान की प्राप्ति: जो पुरुष गौ की सेवा और सब प्रकार से उनका अनुगमन करता है, उस पर संतुष्ट होकर गौ माता उसे अत्यंत दुर्लभ वर प्रदान करती है।

गौ सेवा से मनोकामनाओ की पूर्ति: गौ की सेवा यानि गाय को चारा डालना, पानी पिलाना, गाय की पीठ सहलाना, रोगी गाय का ईलाज करवाना आदि करने वाले मनुष्य पुत्र, धन, विद्या, सुख आदि जिस-जिस वस्तु की इच्छा करता है, वे सब उसे प्राप्त हो जाती है, उसके लिए कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं होती।

भूमि दोष समाप्त होते है: गौ का समुदाय जहा बैठकर निर्भयतापूर्वक साँस लेता है, उस स्थान की शोभा को बढ़ा देता है और वह के सारे पापो को खीच लेता है।

सबसे बड़ा तीर्थ गौ सेवा: देवराज इंद्र कहते है- गौ में सभी तीर्थ निवास करते है। जो मनुष्य गाय की पीठ स्पर्श करता है और उसकी पूछ को नमस्कार करता है वह मानो तीर्थो में तीन दिनों तक उपवास पूर्वक रहकर स्नान कर लेता है।

मंगल होगा: जिसके घर बछड़े सहित एक भी गाय होती है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते है और उसका मंगल होता है।

गोपूजा–विष्णुपूजा: भगवान् विष्णु देवराज इन्द्र से कहते है कि हे देवराज! जो मनुष्य अस्वस्थ वृक्ष और गौ की सदा पूजा सेवा करता है, उसके द्वारा देवताओं, असुरो और मनुष्यों सहित सम्पूर्ण जगत की भी पूजा हो जाती है। उस रूप में उसके द्वारा की हुई पूजा को मैं यथार्थ रूप से अपनी पूजा मानकर ग्रहण करता हूँ।

असार संसार छः सार पदार्थ: भवान विष्णु, एकादशी व्रत, गंगानदी, तुलसी, ब्रह्मण और गाय – ये ६ इस दुर्गम असार संसार से मुक्ति दिलाने वाले है।

गो सेवा के चमत्कार

  • गौ के दर्शन, पूजन, नमस्कार, परिक्रमा, गाय को सहलाने, गौग्रास देने तथा जल पिलाने आदि सेवा के द्वारा मनुष्य दुर्लभ सिद्धियाँ प्राप्त होती है।
  • गो सेवा से मनुष्य की मनोकामनाएँ जल्द ही पूरी हो जाती है।
  • गाय के शरीर में सभी देवी-देवता, ऋषि मुनि, गंगा आदि सभी नदियाँ तथा तीर्थ निवास करते है। इसीलिये गौसेवा से सभी की सेवा का फल मिल जाता है।
  • गौ को प्रणाम करने से – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारो की प्राप्ति होती है। अतः सुख की इच्छा रखने वाले बुद्धिमान पुरुष को गायो को निरंतर प्रणाम करना चाहिए।
  • ऋषियों ने सर्वश्रेष्ठ और सर्वप्रथम किया जाने वाला धर्म गौसेवा को ही बताया है।
  • प्रातःकाल सर्वप्रथम गाय का दर्शन करने से जीवन उन्नत होता है।
  • यात्रा पर जाने से पहले गाय का दर्शन करके जाने से यात्रा मंगलमय होती है।
  • जिस स्थान पर गायें रहती है, उससे काफी दूर तक का वातावरण शुद्ध एवं पवित्र रहता है, अतः गोपालन करना चाहिए।
  • भगवान् विष्णु भी गौसेवा से सर्वाधिक प्रसन्न होते है, गौ सेवा करने वाले को अनायास ही गौलोक की प्राप्ति हो जाती है।
  • प्रातःकाल स्नान के पश्चात सर्वप्रथम गाय का स्पर्श करने से पाप नष्ट होते है।
उत्पाद

  • गौदुग्ध – धरती का अमृत: गाय का दूध धरती का अमृत है। विश्व में गौ दुग्ध के सामान पौष्टिक आहार दूसरा कोई नहीं है। गाय के दूध को पूर्ण आहार माना गया है। यह रोग निवारक भी है। गाय के दूध का कोई विकल्प नहीं है। यह एक दिव्य पदार्थ है। वैसे भी गाय के दूध का सेवन करना गौ माता की महान सेवा करना ही है। क्योकि इससे गोपालन को बढ़ावा मिलता है और अप्रत्यक्ष रूप से गाय की रक्षा ही होती है। गाय के दूध का सेवन कर गौमाता की रक्षा में योगदान तो सभी दे ही सकते है।
  • पंचगव्य: गाय के दूध, दही, घी, गोबर रस, गो-मूत्र का एक निश्चित अनुपात में मिश्रण पंचगव्य कहलाता है। पंचगव्य का सेवन करने से मनुष्य के समस्त पाप उसी प्रकार भस्म हो जाते है, जैसे जलती आग से लकड़ी भस्म हो जाते है। मानव शरीर का ऐसा कोई रोग नहीं है, जिसका पंचगव्य से उपचार नहीं हो सकता। पंचगव्य से पापजनित रोग भी नष्ट हो जाते है।पंचगव्य में (गोमूत्र, गोमय, घी, दूध, दही) पाये जाने वाले तत्व निम्न प्रकार के है:-
    • दूध – 6 प्रकार के विटामिन, 8 प्रकार के प्रोटीन, 25 प्रकार के खनिज तत्व, 21 प्रकार के एमिनो एसिड, 19 प्रकार के किणवनण, ४ प्रकार के फास्फोरस यौगिक, २ प्रकार की शर्करा, स्वर्गतत्व – केरिटिन, कैंसर निरोधक मद्गी, बुध्दि व स्मृतिवर्धक, रेडियोधर्मिता नाशक सेरीब्रोसाड्स ।
    • गोमूत्र – पोटासियम, कैल्शियम, मैग्निशियम, फलोराईड, यूरिया, फास्फोरस, अमोनिया, कुटिनिन, एसिड,लोह तत्व, ताम तत्व फास्फोरस, सल्फर, लेंटोंज, जल तत्व ।
    • गौमय – नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटासियम,लोह तत्व, बोरोन, मोलिन्दनम्, औरकस, कोबाल्ट एल्फेड, चुना, सोडियम गंधक।
    • लाखों वर्षो से गोबर, गोमूत्र धरती की उर्वरा शक्ति बढ़ाता आया है । यूरिया के कारण उपजाऊ प्रदेश, पंजाब, हरियाणा में भूमि बंजर होती जा रही है ।
  • गोधूली महान पापों की नाशक है: गायो के खुरो से उठी हुई धूलि, धान्यो की धूलि तथा पुट के शरीर में लगी धूलि अत्यंत पवित्र एवं महापापो का नाश करने वाले है।
  • चारो सामान है: नित्य भागवत का पाठ करना, भगवान् का चिंतन, तुलसी को सींचना और गौ की सेवा करना ये चारो सामान है।
गोजन के लाभ

  • गाय का दूध 2 घंटे में हजम होता है । भैंस का 9 घंटे में हजम होता है ।
  • कुपोषण को दूर करता है ।
  • पूर्ण आहार है ।
  • गाय का दूध , कफ नाशक है । भैंस का कफ वर्धक है ।
  • कैलोस्ट्रोल कम करता है । भैंस का कैलोस्ट्रोल बढ़ता है ।
  • देसी गाय का दूध कैंसर को दूर करता है । जर्सी गाय का दूध कैंसर को बढ़ाता है ।
  • गाय के कूब में सूर्यकेतु नाड़ी होती है जो की सौर ऊर्जा को आकर्षित करती है । इसके कारण कैरीटिन तत्व का निर्माण होता है । इसी कारण यह पिला होता है । जो की स्वर्ण रसायन तत्व होता है जो बल, बुध्दि वर्धक है ।
  • गौ मूत्र में MDGI तत्व का निर्माण होता है, जो कैंसर निरोधी हैं ।
  • देवलादार गौशाला (नागपुर) को अनुसंधान के आधार पर US पेंटेंट प्राप्त हुआ है । (कैंसर निरोधी अनुसंधान के कारण प्राप्त हुआ पेटेंट )
  • गाय का बच्चा , जन्म के समय ही खड़ा हो जाता है । भैंस का कट्टा 4 दिन में खड़ा होता है ।
  • भैंस व जर्सी गाय खूटें से बंधकर दूध देती हैं । देसी गाय चारागाहों में चर कर (5 या 6 कि।मि। घूम कर) दूध देती है । गाय के लिए 6 कि।मि। चलना अनिवार्य होता है । वरना बिमारियों की संभावना बड़ जाती है ।
  • गौचरी शब्द गाय के चरने से बना है । अर्थात यह पौधे को जड़ से उखाड़ कर यह कर नहीं खाती अपितु पौधे के अग्रभाग को ही खाती है । इसी प्रकार जैन संत भी गौचरी करते हैं । एक समय के आहार के लिए 6, 8 घंटों से प्राप्त आहार स्वीकार करते हैं ।
  • भारत में गाय की 100 से ऊपर नस्ले थी, अब केवल 22 नस्ले शेष हैं ।
  • गाय के ग;अले की भाल को हाथ फैरने से रक्तचाप सामान्य हो जाता है ।
  • गाय के करोड़ों रोमों से, गूगल की गंध प्रवाहित होती है । जिसके कारण वायुमण्डल का प्रदूषण नष्ट होता है,शुध्द होता है ।
  • विश्व में गाय ही ऐसा प्राणी है जिसके उचवास(श्वास छोड़ने) में घंटे ऑक्सीजनप्रवाहित होती है ।
  • टी. बी. के मरीज यदि गौशाला में रहे ६ महीने, तो टी। बी दूर हो जाती है ।
  • गाय के सीगों में आकाश तत्व आकर्षित करने की शक्ति है ।
  • भगवान कृष्ण गौ पालक थे इसीलिए इनका नाम गौपाल था ।
  • गौवर्धन के दिन गायों की पूजा की जाती है सरे बृज में ।
  • गाय का बछड़ा, 1000 गायों में भी अपनी माँ का खोज सकता है । जबकि भीड़ में भैंस का कट्टा माँ को पहचान नहीं पता ।
  • गीता में भगवान कृष्ण ने खा था , गायों में कामधेनु में हूँ ।
  • जर्मनी के कृषि वैज्ञानिक जुलिशसिक के मत के अनुसार गाय प्राणवायु-ऑक्सीजन छोड़ती है ।
  • गाय प्रेम, त्याग, करुणा, उदारता, धैर्य, गंभीरता, एवं संतोष की शाक्षत मूर्ति है , गाय के साथ रहने वाले मनुष्य में भी यही प्रवृति विकसित होगी ।
  • गाय का दूध, गोबर, मूत्र, घी, सेवन करने से सोराइसिस जैसी असाध्य रोग 100% ठीक हो जाता है ।
  • गाय को शास्त्रों में अध्न्या (जो वध के लायक नहीं है) खा गया है ।
  • गाय विश्वस्य मातरा सम्पूर्ण जीवन गाय का दूध पिया जा सकता है ।
  • गभवती महिला चंडी की कटोरी में गाय के दूध का दही जमाकर सेवन करे तो सुंदर बालक/बालिका होगी ।
  • पहली रोटी गाय के लिए निकलनी चाहिये यह शास्त्रों का निर्देश है ।
  • महाराजा दशरथ ने यज्ञ के अवसर पर 10 लाख गायों का दान किया था ।
  • 10 ग्राम (1 तोला) गाय के घी को अग्नि में आहुति देने से एक टन ऑक्सीजन का निर्माण होता है ।दोनों में गोदान सर्वश्रेस्ठ है ।
  • कामधेनु, कपिला समुद्र मंथन में निकली थी ।
  • भारतीय संस्कृति की दृस्टि में गाय का महत्व, गंगा और गायत्री से भी बढ़कर है । इसलिए वेदों में गायों के गुणों का उल्लेख मिलता है । यदि वाक् गायत्री है , प्राण गंगा है तो मन गऊ है ।
  • गऊ और गऊ की संतान वेदों के अनुसार दोनों ही दिव्य पशु हैं ।
  • गाय के घी को 2-2 बुँदे सोने से पूर्व नाक में डाली जाएँ तो एक माह में पुराने से पुराने माइग्रेन सदा के लिए ठीक हो जायेगा।
  • गाय के दूध में A-2 तत्व कैंसर रोधी व मस्तिष्क को बिमारियों से बचाता है । प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है ।