हिंदू धर्म और अन्य धर्मों के बीच मुख्य अंतर क्या हैं?

हिंदू धर्म और अन्य धर्मों के बीच मुख्य अंतर:-

सत्य निरपेक्ष है या सापेक्ष: हिन्दू धर्म में सत्य को निरपेक्ष माना गया है अर्थात सत्य इसलिए सत्य नहीं कि वह किसी आप्त पुरुष या ईश्वर द्वारा कथित है अपितु वह अपने आप में सत्य है इसलिए आप्त पुरुष ने सत्य को कथित किया है । यदि कोई आप्त पुरुष सत्य को असत्य करार दे दे तो भी सत्य, सत्य ही रहेगा न कि वह असत्य हो गाएगा । इसके विपरीत इस्लाम, इसाई या अन्य गैर हिन्दू धर्म में सत्य को सापेक्ष माना गया है । इन धर्मावलंबियों के अनुसार सत्य इसलिए सत्य है कि उक्त कथन उनके श्रद्धेय मोहमद, ईसा मसीह या उनके आप्त पुरुष द्वारा कथित है न कि सत्य अपने आप में सत्य है ।

अहिंसा परमो धर्मः अहिंसा या दया हिन्दू धर्म का मूल है तभी तो कहा गया है- जहाँ दया तहां धर्म है….. । इसलिए हिन्दू ऐसे धर्म की कल्पना नहीं कर सकता जिसमें हिंसा का जरा सा भी समावेश किया गया हो । बाइबल पढते हुए कोई हिन्दू जब यह लिखा हुआ पाता है कि ईसा मसीह ने एक रोटी और एक सूखी मछली से सभी अनुयाइयों का पेट भर दिया तो वो समझ नहीं पाता कि यह कैसा ईश्वर है या ईश्वर का पुत्र है जिसे पेट भरने के लिए मछली को मारना या खाना पडा ? इसस अच्छा तो वो भूखा रह लेता । एक हिन्दू कुछ इसी प्रकार की धारणा इसलाम या अन्य उन सभी धर्मों के प्रति रखता है जो अहिंसा का समर्थन निरपेक्ष रूप से नहीं करते । हिन्दू और अन्य धर्मों में यह दूसरा मुख्य अंतर है । हिन्दू जीव मात्र के लिए दया और कल्याण की भावना रखता है जबकि अन्य धर्म ऐसा नहीं सोचते ।

आत्मा की एकता और अमरता: हिन्दू न केवल आत्मा को अजर अमर मानता है अपितु सभी आत्माओं की एकता में भी विश्वास करता है अर्थात वो मानता है कि सभी जीवों में एक जैसी आत्मा निवास करती है इसके विपरीत अन्य धर्म यह मानते है कि ईश्वर ही आत्माओं को पैदा करता है और वही नष्ट भी करता है । इसाई धर्म तो पशुओं में आत्मा के अस्तित्व को नकारते हुए केवल मनुष्यों में ही इसके अस्तित्व को स्वीकारता  है । यही कारण है कि वो इसे उपभोग की वस्तु मानता है जिसे मनुष्यों के उपभोग के लिए ईश्वर ने सृजित किया है । इसके विपरीत एक हिन्दू को भोजन या अन्न को जूठा छोडने में भी हिंसा नजर आती है कि इस व्यर्थ किए गए अन्न से किसी अन्य की भूख मिटाई जा सकती थी ।

हिदू खुला जबकि अन्य सभी बंद धर्म है: हिन्दू व अन्य धर्मों में यह अंतर सबसे महत्वपूर्ण है । जब कोई भी नया विचार (या धर्म) पनपता है तो उस वक्त वह सर्वथा उपयुक्त और सत्य प्रतीत होता है लेकिन कलांतर में उसमें कमियां दृष्टिगोचर होने लगती है । ऐसे में इस पूर्ववर्ती विचारधारा के विपरीत दूसरी विचारधारा पनपती है । आगे चलकर इन दोनों विचारधाराओं को समन्वित करने वाली तीसरी विचारधारा का विकास होता है । इस प्रकार से यह किसी विचार या धर्म के विकास के लिए निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है । हिन्दू धर्म कि विशेषता यही है कि यह धर्म किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त मात्र न होकर अनेकानेक व्यक्तियों के विचारों का समुहिक प्रतिफल है जो हजारों सालों में परिमार्जित हुआ है । इस प्रकार से हिन्दू धर्म एक खुला धर्म है जो विचार से नहीं अपितु विवेक से विकसित हुआ है । इसके विपरीत अन्य धर्म चाहे वह इस्मला हो चाहे इसाई या कोई अन्य, सभी बंद धर्म है जो एक व्यक्ति मात्र के विचारों पर आधारित है और जो यह मनकर चलते है कि समय अपरिवर्तित रहता है और व्यक्ति का विवेक भी । इन धर्मों में विचारों के विकास का कोई महत्व नहीं है । यही कारण है कि इन धर्मों में विशेष आग्रह अथवा वैचारिक कट्टरता पाई जाती है । इसाई धर्म में जो थोडी बहुत उदारता पाई जाती है उसका हेतु प्रोटेस्टेंट विचारधारा का विकास है अन्यथा इसाई धर्म भी उतना ही अनुदार और कट्टर होता जितना इस्लाम है । बेशक हिन्दू धर्म भी उतना ही कट्टर होता जितना इसाई या इस्लाम धर्म है यदि इसमें विभिन्न विचारधाराओं का समावेश न हुआ होता ।